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अध्ययन के अनुसार, 50% से अधिक बच्चे NO2 के असुरक्षित स्तर में सांस ले रहे थे।

वायु प्रदूषण की वज़ह से बच्चों में मोटापा होता है

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वायु प्रदूषण की वज़ह से बच्चों में मोटापा होता है
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स्पेन के बार्सिलोना इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ (आईएस-ग्लोबल) द्वारा किए गए एक अध्ययन में कहा गया है कि वायु प्रदूषण के कारण बच्चों में अधिक वजन और मोटापे का खतरा होता है।

यह अध्ययन 31 जनवरी, 2019 को साइंस डायरेक्ट ऑफ एनवायरनमेंट इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित हुआ था।

यह अध्ययन 7 और 10 साल की उम्र के 2,660 बच्चों के साथ किया गया था जो बार्सिलोना में 39 अलग-अलग स्कूलों से थे।

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने वायु प्रदूषण को बच्चों के अधिक वजन और मोटापे के विकसित ख़तरे से जुड़ा हुआ बताया है। बच्चे घर में या प्रमुख रूप से स्कूल में वायु प्रदूषण के संपर्क में आ सकते हैं। ये ऐसे स्थान हैं जहाँ बच्चे अपना अधिकांश समय व्यतीत करते हैं।

पिछले अध्ययनों में भी कम उम्र में मोटापे के विकास के ख़तरे का पता चला है। एनवायरनमेंट इंटरनेशनल में प्रकाशित एक अध्ययन ने पहली बार इस मुद्दे का विश्लेषण किया था। यह अध्ययन आईएस-ग्लोबल द्वारा एक प्रोजेक्ट 'ब्रेथ' के तहत किया गया था।

नया अध्ययन कई बच्चों के वजन और ऊंचाई की जांच के बाद किया गया था। शोधकर्ताओं ने तब उनके मोटापे और अधिक वजन की स्थिति के साथ-साथ उनके बॉडी मास इंडेक्स (BMI) की गणना की।

वायु प्रदूषण के चरणों को मापने के लिए सड़क पर और स्कूल के मैदान में संवेदक का भी उपयोग किया गया था। वायु प्रदूषण में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2), पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5), मौलिक कार्बन (EC) और कई अन्य छोटे छोटे कण शामिल होते हैं।

शोधकर्ताओं द्वारा NO2, NOx, PM2.5, PM10, और PM की अनावरण सीमा का मूल्यांकन भी किया गया। शोध के दौरान, ऐसा तंत्र विकसित किया गया जो वायु प्रदूषण और बच्चों में अधिक वजन के कारणों को जोड़ता था। जानवरों पर किए गए अध्ययन यह भी इंगित करते हैं कि वायु प्रदूषण शरीर में ऑक्सीडेटिव तनाव, प्रणालीगत सूजन या इंसुलिन प्रतिरोध को प्रोत्साहित कर सकता है।

इस अध्ययन में पाया गया कि बच्चे वायु प्रदूषण में अनुमत स्तरों से ज़्यादा सांस ले रहे थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) पहले ही स्कूल और घर दोनों जगह पर प्रदूषण के स्वीकार्य स्तरों को स्पष्ट कर चुका है।

नए अध्ययन की मुख्य बात यह थी कि इस अध्ययन में 75 प्रतिशत से अधिक बच्चे PM2.5 स्तरों के संपर्क में पाये गए थे। इसके अलावा, 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे NO2 में सांस ले रहे थे, जिसे असुरक्षित माना जाता है।

आईएस-ग्लोबल के शोधकर्ता में से एक, जेरोइन डी बोंट ने कहा, "हमने देखा कि स्कूल में बच्चों को वायु प्रदूषण के निचले स्तर पर होने से इतना ख़तरा नहीं था पर वायु प्रदूषण के मध्यम या उच्च स्तर - पराबैंगनी कण, NO2, PM2.5, EC - के संपर्क में आने से मोटापे और वजन का खतरा अधिक था।"

आईएस-ग्लोबल के शोधकर्ता और अध्ययन समन्वयक मार्टिन मार्टीहेड ने बताया, "इस अध्ययन की कुछ सीमाएँ हैं, जिसका अर्थ है कि परिणामों की सावधानीपूर्वक व्याख्या की जानी चाहिए।"

अध्ययन के शोधकर्ताओं ने यह भी व्याख्या की है कि घर पर PM10 के उच्च स्तर के संपर्क में आने से बचपन में ही मोटापे या अधिक वजन का ख़तरा बढ़ जाता है।

यह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा सूचित किया गया है कि वायु प्रदूषण भारत में बीमारियों का प्रमुख कारण है।

गर्भवती महिलाओं का वायु प्रदूषण और घरेलू वायु प्रदूषण में मौजूद PM2.5 के संपर्क में आना कम वजन के शिशु को जन्म देने से जुड़ा हुआ है। भारत में किए गए एक शोध के अनुसार जिन घरों में खाना पकाने के लिए एलपीजी या मिट्टी के तेल की जग़ह ठोस ईंधन का उपयोग किया जाता है, वहां प्रसव से पूर्व जन्म होता है।

अध्ययन से यह भी पता चलता है कि गर्भावस्था के दौरान बायोमास ईंधन का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं को जन्मे बच्चे की उम्र छोटी होती है।

बायोमास ईंधन के रूप में पहचाने जाने वाले वायु प्रदूषण के मूल स्रोत लकड़ी, फसल के अवशेष, लकड़ी का कोयला और गोबर हैं। एक अध्ययन में ग्रामीण भारत के घरों में शिशु मृत्यु दर का खतरा 21 प्रतिशत अधिक पाया गया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार, ठोस ईंधन के जलने के संपर्क में आने से 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में टीबी होने का अधिक ख़तरा होता है। अध्ययन में भारत में बायोमास ईंधन के उपयोग की वज़ह से बच्चों में दमे का विकास भी पाया गया।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह नया शोध एक पार-अनुभागीय अध्ययन है। प्रदूषण और स्वास्थ्य के बीच संघ की निष्पक्ष प्रकृति का निरीक्षण करने के लिए उनके पास पर्याप्त सामग्री नहीं है। वे इससे भी बेहतर निष्कर्ष निकालने के लिए उत्सुक हैं और इसके लिए प्रतिभागियों पर अनुदैर्ध्य अध्ययन किया जाएगा।

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