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स्व-प्रतिरक्षित रोगों का प्रारंभिक चरण में निदान करना कठिन होता है।

अब ल्यूपस रोग का शुरुआत में ही पता लगाना संभव

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अब ल्यूपस रोग का शुरुआत में ही पता लगाना संभव
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वेलेंसिया पॉलिटेक्निक विश्वविद्यालय, स्पेन के शोधकर्ताओं ने स्व-प्रतिरक्षित बीमारियों का पता लगाने के लिए सबसे संवेदनशील प्रणाली विकसित की है।

यह अध्ययन 1 फरवरी, 2019 को आरयूवीआईडी संघ की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित किया गया था। वेलेंसिया पॉलिटेक्निक विश्वविद्यालय, स्पेन इस संघ के सदस्यों में से एक है।

शोधकर्ताओं द्वारा एक प्रणाली विकसित की गई है जो चिकित्सकों द्वारा किए गए परीक्षणों की तुलना में 2,000 गुना अधिक संवेदनशील है। यह तकनीक चिकित्सकों को रोगियों में स्व-प्रतिरक्षित रोगों का पता लगाने में सक्षम बनाती है।

इस प्रणाली को कार्य करने के लिए केवल लार या रक्त की सूक्ष्म मात्रा की आवश्यकता होती है। इससे बीमारी का पता लगाने में सिर्फ एक घंटे का समय लगता है।

आमवातीय संधिशोथ या रक्तिम ल्यूपस जैसे स्व-प्रतिरक्षित रोगों को प्रारंभिक चरण में निदान करना कठिन माना जाता है। ल्यूपस रोग में, कोशिकाओं के नाभिक में विशिष्ट प्रतिपिंड पाए जाते हैं। इन प्रतिपिंडों में आरओ/एसएसए-विरोधी शामिल हैं। इस तरह के प्रतिपिंड रक्त में स्थित होते हैं।

वेलेंसिया की पॉलिटेक्निक विश्वविद्यालय (यूपीवी) के शोधकर्ताओं में से एक, एंजेल मक्वैयरा ने कहा, "प्रत्येक स्व-प्रतिरक्षित रोग एक विशिष्ट अंगुली के निशान के साथ अपने स्वयं के आरओ/एसएसए-विरोधी प्रतिपिंड बनाता है, जो हमारे जैविक संवेदक द्वारा विभेदित होता है।"

मक्वैयरा ने आगे कहा, "इसके अलावा, यह बहुत कम आरओ/एसएसए-विरोधी प्रतिपिंड की मात्रा निर्धारित करता है (वर्तमान नैदानिक परीक्षणों की तुलना में 2,000 गुना अधिक संवेदनशील होने के बराबर), जो रोगी के लक्षणों का बहुत जल्दी आकलन करना संभव बनाता है।"

ला फे अस्पताल के नैदानिक विभाग के रोग विभाग के प्रमुख चिकित्सक जोस एंड्रेस रोमन के अनुसार, "ल्यूपस के 150 से अधिक रोगियों और स्वस्थ लोगों के समूह की गतिविधि द्वारा दिखाए गए लक्षणों का आकलन करने के लिए इस तकनीक से प्राप्त परिणाम, इस नई तकनीक की उच्च संवेदनशीलता की पुष्टि करते हैं। "

वर्तमान परीक्षण उतने उपयोगी नहीं हैं जितना कि नव विकसित संवेदनशील प्रणाली है। पुरानी प्रणाली प्रतिपिंड को उजागर करने की क्षमता को सीमित करती है। इस तरह के प्रतिपिंड बहुत कम मात्रा में होते हैं जो रोग के प्रारंभिक चरणों में होते हैं।

शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में एक अति संवेदनशील जैविक संवेदक विकसित करके पुरानी तकनीकों की कमियों को ख़त्म किया है। यह प्रणाली रोग की प्रारंभिक अवस्था में स्वप्रतिपिंडों की शीघ्र पहचान करने में डॉक्टरों की सहायता करती है।

शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि प्रतिरक्षाविज्ञानी निकायों की उपस्थिति का पता लगाने के लिए चिकित्सकों द्वारा जो परीक्षण किए जाते हैं, वे इएलआईएसए तकनीक का उपयोग करते हैं। ये परीक्षण इएलआईएसए तकनीक की मदद से स्वप्रतिपिंडों का पता लगाते हैं।

वेलेंसिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों में से एक ने समझाया है कि नए जैविक संवेदक में एक नया स्वरूप है। नई प्रणाली का उपयोग करते हुए चिकित्सक प्रतिपिंडों के विस्तार के साथ-साथ इसकी परस्पर क्रिया का भी पता लगा सकते हैं।

रोगों का निदान "उंगलियों के निशान" की सहायता से किया जा सकता है जो प्रत्येक बीमारी में विशेष रूप से होता है। यह एक 2-इन-1 प्रणाली है जो रोगों का निदान करती है।

शोधकर्ताओं को यूपीवी, यूवी और ला फे अस्पताल द्वारा अपने जैविक संवेदक का पेटेंट प्राप्त हो गया है। इस जैविक संवेदक का उपयोग अब नैदानिक अभ्यास के लिए किया जा सकता है।

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