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प्लूरिपोटेंट स्टेम कोशिकाएँ CRISPR-Cas9 जीन-संपादित प्रणाली के उपयोग के साथ बनने वाली अपनी तरह की पहली तकनीक है।

प्रतिरोपण अस्वीकरण को रोकने के लिए पहली प्लूरिपोटेंट स्टेम कोशिकाएँ

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प्रतिरोपण अस्वीकरण को रोकने के लिए पहली प्लूरिपोटेंट स्टेम कोशिकाएँ
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कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय सैन फ्रांसिस्को के वैज्ञानिकों ने पहली प्लूरिपोटेंट स्टेम कोशिकाएँ विकसित की हैं जो प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए अदृश्य होंगी। यह अध्ययन 18 फरवरी 2019 को नेचर बायोटेक्नोलजी में प्रकाशित हुआ था।

प्लूरिपोटेंट स्टेम कोशिकाएँ CRISPR-Cas9 जीन-संपादित प्रणाली के उपयोग के साथ बनने वाली अपनी तरह की पहली तकनीक है। इन स्टेम कोशिकाओं को एक प्रयोगशाला में विकसित किया गया था और कहा जाता है कि यह प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए कार्यात्मक रूप से अदृश्य होती हैं।

प्रतिरक्षा प्रणाली को निष्ठुर माना जाता है। यह इस तरीके से काम करता है कि जिस भी चीज़ को यह नहीं पहचानता या उससे कोई भी चीज़ अलग लगती है तो वो उससे हटा देता है। इस प्रकार, यह मानव शरीर को संक्रामक पदार्थों से बचाता है।

जब किसी मानव शरीर पर प्रतिरोपण प्रक्रिया की जाती है, तो प्रतिरोपित ऊतकों, कोशिकाओं या अंगों को प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा हानिकारक माना जाता है और इस प्रकार प्रतिरोपण अस्वीकरण हो जाता है। चिकित्सा के शब्दों में जब प्रतिरोपण का अस्वीकरण होता है, तो रोगी और दाता को "उतक-अनुरूपता बेमेल" कहा जाता है।

इस प्रकार, जीन-संपादित प्लूरिपोटेंट स्टेम कोशिकाएँ बनाने की आवश्यकता दिखाई दी। ये स्टेम कोशिकाएँ सार्वभौमिक स्टेम कोशिकाएँ होती हैं जो कि प्रत्येक रोगी के लिए अलग-अलग तरह से बनी स्टेम कोशिकाओं की तुलना में अधिक प्रभावी होती हैं।

स्टेम कोशिका प्रतिरोपण के क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने सोचा कि अस्वीकरण की समस्या को इंडियुस्ड प्लूरिपोटेंट स्टेम सेल्स (IPSCs) द्वारा हल हो गई थी। ये स्टेम कोशिकाएँ वसा कोशिकाओं या त्वचा से बनी होती हैं क्योंकि ये पूरी तरह परिपक्व होती हैं। फिर उन्हें उन तरीकों द्वारा परिवर्तित किया जाता है जो उन्हें कई कोशिकाओं में विकसित करने की अनुमति देते हैं।

वैज्ञानिकों मूल रूप से कोशिकाओं को दान करने वाले मरीज़ों में IPSCs कोशिकाओं का प्रतिरोपण किया। यह माना जाता था कि यदि शरीर प्रत्यारोपित iPSCs कोशिकाओं को "स्वयं" के रूप में को देखेगा तो वे कोशिकाओं पर हमला नहीं करेगा।

कई रोगियों की कोशिकाएँ इस परिवर्तन के लिए प्रतिकूल साबित हुईं। यह प्रक्रिया महंगी है और समय लेने वाली है क्योंकि हर मरीज के लिए अलग से IPSC बनाना मुश्किल है। IPSCs प्रौद्योगिकी के साथ प्रमुख समस्या प्रजनन और गुणवत्ता का नियंत्रण है।

इसलिए, इन चुनौतियों को पार करने के लिए वैज्ञानिकों ने "सार्वभौमिक" IPSCs कोशिकाएं बनाई जो अनुकूल और कुशल थी।

टोबायस ड्यूस, एमडी और अध्ययन के प्रमुख लेखक कहते हैं, “वैज्ञानिक अक्सर प्लूरिपोटेंट स्टेम कोशिकाओं की चिकित्सीय क्षमता को टाल देते हैं, जो किसी भी वयस्क ऊतक में परिपक्व हो सकते हैं, लेकिन प्रतिरक्षा प्रणाली सुरक्षित और प्रभावी स्टेम कोशिका चिकित्सा के लिए हमेशा से एक प्रमुख बाधा रही है।"

सोनजा स्क्रैफ़र, पीएचडी और अध्ययन के एक वरिष्ठ लेखक कहते हैं, “हम उन दवाओं का प्रशासन कर सकते हैं जो प्रतिरक्षा गतिविधि को दबा देती हैं और अस्वीकरण की संभावना कम कर देती हैं। दुर्भाग्य से, ये प्रतिरक्षादमनकारी मरीजों को संक्रमण और कैंसर के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं।"

अध्ययन के दौरान, उतक-अनुरूपता बेमेल प्राप्तकर्ताओं में अस्वीकरण से बचने के लिए तीन जीनों को IPSCs के लिए बदला दिया गया था। वैज्ञानिकों ने CRISPR का उपयोग दो जीनों को हटाने के लिए किया जो कि हिस्टोकॉम्पैटिबिलिटी कॉम्प्लेक्स (MHC) वर्ग I और II नामक प्रोटीन के कार्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।

जिन कोशिकाओं में MHC प्रोटीन नहीं होता, वे नेचुरल किलर (NK) कोशिका नामक प्रतिरक्षा कोशिकाओं का निशाना बन जाती हैं। CD47, एक कोशिका सतह प्रोटीन है जो NK कोशिकाओं के प्रभाव के खिलाफ काम करता है। इस परिणाम के साथ, वैज्ञानिकों ने CD47 जीन को एक विषाणु में डाला।

वैज्ञानिकों ने तब चूहे की स्टेम कोशिकाओं को एक सामान्य प्रतिरक्षा प्रणाली के साथ बेमेल चूहों में प्रत्यारोपित किया और देखा कि कोई अस्वीकरण नहीं हुआ। उसके बाद वैज्ञानिकों ने मानव स्टेम कोशिकाएं मानवीय चूहे में प्रतिरोपित की, जिनकी प्रतिरक्षा प्रणाली को मानव प्रतिरक्षा प्रणाली के तत्वों के साथ बदल दिया गया था। परिणाम वही था, प्रतिरोपण का कोई अस्वीकरण नहीं हुआ।

इन प्लूरिपोटेंट स्टेम कोशिकाओं के विकास के साथ, यह लोगों की मदद करने और दवाईयों को पुनर्जन्म देने की तरफ एक कदम है।

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