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आंत बैक्टीरिया लेवोडोपा के स्तर को प्रतिबंधित कर सकता है।

आंत के जीवाणु पार्किंसंस रोग के उपचार को प्रभावित कर सकते हैं

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आंत के जीवाणु पार्किंसंस रोग के उपचार को प्रभावित कर सकते हैं
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यूनिवर्सिटी ऑफ ग्रोनिंगन के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में कहा है कि पेट के जीवाणु लेवोडोपा के स्तर को रोक कर पार्किंसंस रोग के उपचार को प्रभावित कर सकते हैं।

यह अध्ययन 18 जनवरी, 2019 को नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में प्रकाशित हुआ था।

इस अध्ययन के अनुसार, हमारे आंत के जीवाणु पार्किंसंस रोगी को दी गई दवा के प्रभाव को कम करते हैं।

पार्किंसंस रोग (PD) एक केंद्रीय स्नायुतंत्र का विकार है जो हमारी गति को प्रभावित करता है। इस बीमारी के कारण कंपकंपी, धीमी गति, शरीर में अकड़न और संतुलन में कमी होती है।

पार्किंसंस से पीड़ित रोगियों का आमतौर पर लेवोडोपा से इलाज किया जाता है। लेवोडोपा पार्किंसंस रोगियों को दी जाने वाली प्रमुख दवाओं में से एक है।

यह दवाऐं रोगी के छोटी आंत में घुल जाती हैं और रक्तप्रवाह के माध्यम से मस्तिष्क में प्रवेश करती हैं। शोध के दौरान, यह पाया गया कि आंत के जीवाणु लेवोडोपा को डोपामाइन में चयापचय करते हैं।

डोपामाइन मस्तिष्क में एक तंत्रिकासंचारक है। मस्तिष्क में डोपामाइन रक्त-अवरोध को पार करने में असमर्थ होता है। इसलिए, यह दवा की प्रभावशीलता को कम करता है।

सहर एल ऐडी, माइक्रोबायोलॉजी में सहायक प्रोफेसर और अध्ययन की प्रमुख अन्वेषक ने कहा, “यह अच्छी तरह से स्थापित है कि आंत के जीवाणु मस्तिष्क को प्रभावित कर सकते हैं। आंत के बैक्टीरिया और मस्तिष्क के बीच एक सतत रासायनिक संवाद है।"

एल ऐडी ने आगे कहा, "लेकिन पार्किंसंस रोग के रोगियों लेवोडोपा के जो स्तर मस्तिष्क तक पहुंचेंगे वह भिन्न होंगे, और जिस वजह से हमने सवाल किया कि क्या आंत के जीवाणु इस अंतर में भूमिका निभा रहे थे।"

आंत के जीवाणु, जिन्हें माइक्रोबायोटा भी कहा जाता है, वे सूक्ष्मजीव हैं जो मानव और अन्य जानवरों की आंत जैसे पाचन तंत्र में रहते हैं।

एक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि मानव स्वास्थ्य और रोगों पर भी आंतों के जीवाणु का एक बड़ा प्रभाव होता है। मानव की दर्द प्रतिक्रियाएं, प्रतिरक्षा प्रणाली, मस्तिष्क के विकास, तनाव, चयापचय, या व्यवहार यह सभी माइक्रोबायोटा की गड़बड़ी से जुड़े हुए हैं।

पार्किंसंस रोग वैश्विक जनसंख्या के 1% लोगों को प्रभावित करता है जिनकी उम्र 60 वर्ष से अधिक है। यह दूसरा सबसे आम न्यूरोडीजेनेरेटिव विकार है। पार्किंसंस के रोगियों को सुगंधित एमिनो एसिड अवरोधक के साथ लेवोडोपा दवा दी जाती है।

अध्ययन के शोधकर्ताओं में से एक ने कहा कि आंत में जीवाणु की उपस्थिति बता सकती है कि क्यों कुछ रोगियों को अपने रोग का इलाज करने के लिए लेवोडोपा की लगातार अधिक खुराक की आवश्यकता होती है। लेकिन बीमारी के इलाज के लिए दी जाने वाली दैनिक खुराक के कई दुष्प्रभाव होते हैं, जिसमें डिस्केनेसिया जैसे बड़े खतरे भी शामिल हैं।

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