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जिन पुरुषों का हार्मोनल विरोधी दवाओं से इलाज किया गया था, उनमें अवसाद से पीड़ित होने की संभावना 1.8 गुना अधिक पाई गई थी।

पौरुष ग्रंथि के कैंसर से पीड़ित पुरुषों में हार्मोनल उपचार बढ़ाता है अवसाद का खतरा

लेखक दामिनी  •  
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पौरुष ग्रंथि के कैंसर से पीड़ित पुरुषों में हार्मोनल उपचार बढ़ाता है अवसाद का खतरा
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शोधकर्ताओं द्वारा यह पाया गया है कि पौरुष ग्रंथि के हटाने के बाद हार्मोनल-विरोधी उपचार प्राप्त करने वाले पुरुषों में अवसाद होने की अधिक संभावना रहती है।

यह जानकारी यूरोपियन एसोसिएशन ऑफ यूरोलॉजी द्वारा 18 मार्च, 2019 को प्रकाशित की गई थी।

जिन पुरुषों को पौरुष ग्रंथि के हटाने के बाद यह उपचार दिया जाता है, उनमें अनुपचारित पुरुषों की तुलना में अवसाद होने की 80 प्रतिशत अधिक संभावना होती है। इस शोध के अंतर्गत शोधकर्ताओं ने शल्यचिकित्सा के पश्चात के अवसाद के खतरे को जांचने के लिए रोगियों की निगरानी शुरू कर दी है। यह उन रोगियों के लिए सुझाया गया जाता है जिन्होंने एण्ड्रोजन अभाव चिकित्सा प्राप्त की होती है।

चिकित्सकों द्वारा यह कहा गया है कि जिन पुरुषों में कैंसर पाया जाता है उनमें अवसाद होने की भी आशंका होती है। मूत्र पथ संबंधी कैंसर से पीड़ित पुरुषों में आत्महत्या की दर भी अत्यधिक बढ़ रही है। अब शोधकर्ताओं ने उन पुरुषों में अवसाद की बढ़ती प्रवृत्ति को भी साबित कर दिया है जो रेडिकल प्रोस्टेटक्टोमी के बाद हार्मोनल-विरोधी उपचार प्राप्त करते हैं।

इस अध्ययन के दौरान, शोधकर्ताओं ने डेनिश प्रोस्टेट कैंसर रजिस्ट्री से 5,570 पुरुषों की चिकित्सा संबंधी जानकारी की जांच की थी। इस जाँच में यह पाया गया कि इन सभी पुरुषों में से 773 में पौरुष ग्रंथि के कैंसर की शल्यचिकित्सा के बाद अवसाद का इलाज किया गया था।

जिन पुरुषों का हार्मोनल विरोधी दवाओं से इलाज किया गया था, उनमें अवसाद से पीड़ित होने की संभावना 1.8 गुना अधिक पाई गई थी। रेडिकल प्रोस्टेटैक्टोमी के बाद क्ष-रश्मि-चिकित्सा और अवसाद के बीच संपर्क को भी शोधकर्ताओं द्वारा जांचा गया था लेकिन इसके परिणाम अस्थिर थे।

इस अध्ययन के शोधकर्ताओं में से एक ने कहा है कि इस उपचार से पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन जैसे एंड्रोजन हार्मोन का विकास रुक जाता है। यह भी बताया गया है कि कम टेस्टोस्टेरोन पुरुषों के स्वस्थ्य को प्रभावित कर सकता है।

इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता, डॉ ऐनी सोफी फ्रीबर्ग ने कहा, "हार्मोनल-विरोधी उपचार रसौली संबंधी कोशिकाओं की वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए दिया जाता है। दुर्भाग्य से यह पाया गया है कि यह भी अवसाद से जुड़ा हुआ है।”

पौरुष ग्रंथि के कैंसर पर ईएयू (EAU) दिशानिर्देश समिति के रोगी सदस्य, श्री एरिक ब्रियर्स ने कहा, "यह अध्ययन रोगी के दृष्टिकोण के अनुसार बहुत संबंधित है; यह फिर से पौरुष ग्रंथि के कैंसर के रोगियों में मनो-अर्बुदविज्ञान और सामाजिक-मनोविज्ञान पेशेवरों सहित समग्र उपचार के महत्व को दर्शाता है।”

शोधकर्ताओं द्वारा यह पाया गया है कि जिन पुरुषों में पौरुष ग्रंथि का कैंसर नहीं होता है, उनकी तुलना में प्रोस्टेटैक्टोमी से ग्रसित रोगियों में अवसाद का खतरा बढ़ जाता है। शल्यचिकित्सा के बाद, रोगियों में स्तंभन दोष और मूत्र असंयम होना सामान्य लक्षण हैं। इसके अलावा, टेस्टोस्टेरोन के स्तर में कमी सीधे पुरुषों के मस्तिष्क की मनोदशा को नियंत्रित करने वाले क्षेत्रों को प्रभावित कर सकती है।

जैसे ही एक-चौथाई पुरुष रेडिकल प्रोस्टेटैक्टॉमी से गुजरते हैं, उनका हार्मोनल उपचार किया जाता है। एक बार हार्मोनल उपचार शुरू करने के बाद, इन पुरुषों में अवसाद का खतरा अधिक रहता है। शल्यचिकित्सा में विफलता होना उन परिणामों में से एक हो सकता है जो सीधे हार्मोनल हेरफेर का कारण बनते हैं।

इस अध्ययन से यह भी पता चलता है कि पौरुष ग्रंथि के कैंसर का इलाज पुरुषों में अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। इससे बचने के लिए पौरुष ग्रंथि के कैंसर के इलाज के लिए एक बहु-अनुशासनात्मक दृष्टिकोण की ज़रूरत है। चिकित्सकों द्वारा साक्ष्य-आधारित दिशानिर्देशों का पालन करने की आवश्यकता है ताकि उपचार के दौरान रोगी को व्यापक देखभाल मिल सके।

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