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मानव शरीर के अंदर माइकोबैक्टीरियम लेपरा बैक्टीरिया।

कुष्ठ रोग ने भारत में की वापसी

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कुष्ठ रोग ने भारत में की वापसी
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कुष्ठ रोग क्या है?

कुष्ठ रोग एक हल्का संक्रामक जीवाणु संक्रमण है जो माइकोबैक्टीरियम लेपरा के कारण होता है। यह रोग त्वचा, परिधीय नसों, आंखों, हड्डियों और ऊपरी श्वसन पथ को नुकसान पहुंचा सकता है।

कुष्ठ रोग के लक्षण 20 साल तक नहीं देखे जा सकते हैं और यह किसी भी उम्र और लिंग को संक्रमित कर सकता है। यदि इलाज नहीं किया जाता है, तो कुष्ठ रोग व्यक्ति के स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है जैसे कि संवेदना की कमी, उत्तकों का अध: पतन और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं जिनके कारण विकलांगता हो सकती हैं।

भारत में कुष्ठ रोग का इतिहास

कुष्ठ रोग सबसे पुरानी बीमारी है। इस बीमारी से बहुत सारे कलंक और गलतफहमियां जुड़ी हुई हैं। लोग इससे भयभीत रहते थे और इसे अभिशाप मानते थे। कई बार कुष्ठ रोगियों को समाज से बाहर कर दिया जाता था। शोधकर्ताओं के अनुसार, कुष्ठ रोग कम से कम 4000 ईसा पूर्व से अस्तित्व में है।

भारत ने 2005 में कुष्ठ रोग से खुद को आज़ाद घोषित कर दिया गया था। कुष्ठ रोग से मुक्त शीर्षक पाने के एक दशक बाद ही, डब्ल्यूएचओ ने एक नई रिपोर्ट जारी की जिसमें कहा गया है कि भारत में कुष्ठ रोग के कुल वैश्विक मामलों के 60 प्रतिशत मामले पाए गए हैं।

भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के केंद्रीय कुष्ठ रोग प्रभाग द्वारा जारी नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में लगभग 1,35,485 नए कुष्ठ रोग के मामले सामने आए हैं। भारत में हर चार मिनट में एक नए मरीज को कुष्ठ रोग से पीड़ित बताया जाता है।

विशेषज्ञों की राय

निकिता सारा, जो द लेप्रोसी मिशन में वकालत और संचार की प्रमुख हैं, उन्होंने कहा, “उन्मूलन की स्थिति सहयोगी देशों से धन जुटाने में एक बाधा के रूप में साबित हुई। उन्होंने नहीं सोचा था कि कुष्ठ रोग भारत में चिंता का कारण है।”

बॉम्बे लेप्रोसी प्रोजेक्ट के निदेशक डॉ. विवेक पाई कहते हैं, ''वे केवल कुष्ठ रोग के मार्कर के रूप में त्वचा के घावों की पहचान करना जानते हैं। वे उपग्रह मामले हैं जहां रोग के प्रसार पर विचार करना है। कुष्ठ रोग को समुदाय में फैलने से रोकने के लिए उन्हें प्राथमिक मामलों का निदान करना चाहिए।”

उठाए गए कदम

भारत में, आज आशा के (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कारकर्ताओं) ने देश भर में कुष्ठ रोग के मामलों का पता लगाने के लिए जिम्मेदारियां ली हैं। आशा की मुख्य भूमिका ग्रामीण क्षेत्रों में 1000 लोगों और शहरी क्षेत्रों में 2500 लोगों का पता लगाना है।

स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के अनुसार, भारत में एमडीटी पर्याप्त रूप से मौजूद है, हालांकि, गलत धारणा और देरी से निदान होने के कारण रोगियों को उचित चिकित्सा देखभाल प्राप्त करना असंभव हो सकता है या इसमें बहुत देर हो जाती है।

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