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मैंगनीज के संपर्क में आने वाले वेल्डर में पार्किंसंस के लक्षणों को विकसित करने का खतरा अधिक होता हैं।

धातु के सम्पर्क में आना और पार्किंसन रोग के लक्षणों के बीच संबंध पाया गया

लेखक हर्षिता  •  
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धातु के सम्पर्क में आना और पार्किंसन रोग के लक्षणों के बीच संबंध पाया गया
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शोधकर्ताओं ने कुछ धातुओं के संपर्क में आने के कारण पार्किंसन रोग जैसे लक्षणों के लिए योगदान देने वाली जैविक प्रक्रियाओं का पता लगाने की कोशिश की।

यह अध्ययन आयोवा स्टेट यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित किया गया था और इसे साइंस सिग्नलिंग पत्रिका में 12 मार्च 2019 को प्रकाशित किया गया था।

यह अध्ययन पेन स्टेट यूनिवर्सिटी द्वारा दिए गए चूहों और खून के सीरम के नमूनों पर आधारित जानकारी और आंकड़ों के इस्तेमाल से किया गया था। यह किसी व्यक्ति के मस्तिष्क पर मैंगनीज धातु के प्रभाव को जानने का एक प्रयास है। इस से कुछ प्रकार की धातुओं के संपर्क में आने से मस्तिष्क संबंधी बीमारियों का पता लगाने में मदद मिल सकती है।

मैंगनीज धातु मिश्र धातुओं में पाया जाता है जो व्यापक रूप से उद्योगों में इस्तेमाल किये जाते हैं। इस प्रकार की धातुओं के संपर्क में आने से मस्तिष्क में प्रोटीन प्रभावित प्रभावित हो सकते हैं और मनुष्यों में तंत्रिका संबंधी रोग पैदा कर सकते हैं।

हालांकि मैंगनीज और ऐसी अन्य धातुओं की थोड़ी मात्रा शरीर के लिए हानिकारक नहीं होती है लेकिन इन धातुओं के बहुत ज्यादा संपर्क में आने से मस्तिष्क को नुकसान हो सकता है। ऐसा होने पर व्यक्ति पार्किंसन रोग नामक बीमारी के जैसे लक्षण दिखाना शुरू कर सकता है। पार्किंसन रोग एक प्रगतिशील तंत्रिका विकार है और यह व्यक्ति के शरीर की हलचल को प्रभावित कर सकता है।

इस अध्ययन में पाया गया है कि व्यक्ति के दिमाग में मैंगनीज के अल्फा-सिन्यूक्लिन नामक प्रोटीन के संपर्क में आने से, उसके मस्तिष्क में तंत्रिका विकार पैदा हो सकता है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि रोगात्मक रूप के प्रोटीन शरीर में पुटिकाओं में बंद हो जाते है और कोशिका से कोशिका तक प्रोटीन को घूमाने में मदद करते है। इससे व्यक्ति के दिमाग में प्रोटीन की संख्या बढ़ती जाती है।

ये पुटिकाएं ऊतकों की सूजन का कारण बनती हैं जो रोगियों के दिमाग में तंत्रिका विकार से जुडी प्रतिक्रियाओं को बढ़ा सकते हैं।

पशु चिकित्सा में एक क्लैरेंस हार्टले कोवल्ट डिस्टिंगुइशड प्राध्यापक, अनुमंथा कंथासामी ने कहा, "इस अध्ययन में पाया गया कि मैंगनीज के संपर्क में आने वाले वेल्डर ने प्रभावित अल्फा-सिन्यूक्लिन सीरम सामग्री में वृद्धि दिखाई, जिसका अर्थ यह है कि वेल्डर में पार्किंसन रोग के लक्षणों के विकसित होने का अधिक खतरा है।"

कंथासामी ने आगे कहा, "जैसे जैसे यह बीमारी बढ़ने लगती है, वैसे वैसे उपचार के साथ इसे धीमा करना कठिन होता जाता है। यदि अल्फा-सिन्यूक्लिन का परीक्षण करके इस बीमारी का पहले पता लगाया जा सके, तो यह रोगियों के लिए बेहतर परिणाम ला सकता है। इस तरह के परीक्षण से किसी व्यक्ति को इस बीमारी के जोखिम का संकेत भी मिल सकता है।”

मैंगनीज और तंत्रिका विकारों से संबंधित यह अध्ययन नया नहीं है क्योंकि 1950 से शोधकर्ताओं को यह बात पता है कि मैंगनीज मस्तिष्क की कोशिकाओं को प्रभावित करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जैसे ही व्यक्ति मैंगनीज के संपर्क में आता है, इसके तत्व मस्तिष्क के ऊतकों में जमा हो जाते हैं।

यह नया शोध धातुओं और तंत्रिका संबंधी विकारों के अध्ययनो में एक प्रमुख प्रगति है। यह शोधकर्ताओं को एक नई परख या चिकित्सा परीक्षण के विकास के लिए प्रेरित कर सकता है जो बहुत प्रारंभिक अवस्था में व्यक्ति के शरीर में प्रभावित प्रोटीन अल्फा-सिन्यूक्लिन का पता लगा सकता है।

इसके अलावा, यह पार्किंसन रोग के इलाज में डॉक्टरों की मदद कर सकता है। और इस से, इस बीमारी के प्रभाव या वृद्धि को धीमा करने के लिए दवाओं की प्रभावकारिता को मापने में भी मदद मिल सकती है।

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