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उच्चतम बॉडी मास इंडेक्स वाले बच्चों ने वयस्कता तक पहुंचने पर रक्त के थक्कों के जमने की 30% से 50% की संभावना दिखाई।

मोटे बच्चों में वयस्कता के दौरान शरीर में रक्त के थक्के जमने का खतरा

लेखक हर्षिता  •  
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मोटे बच्चों में वयस्कता के दौरान शरीर में रक्त के थक्के जमने का खतरा
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शोधकर्ताओं ने पाया है कि जो बच्चे बचपन में मोटे होते हैं, उनमें वयस्कता के दौरान रक्त के थक्के जमने का खतरा अधिक होता है। यह अध्ययन 15 मार्च 2019 को जर्नल ऑफ़ अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन में प्रकाशित हुआ था।

डेनमार्क के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में पाया गया है कि अधिक वजन वाले बच्चों को अपनी वयस्कता के दौरान जानलेवा रक्त के थक्के जमने का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन उन्होंने यह भी सुझाव दिया है कि यदि 13 वर्ष की उम्र से पहले मोटे बच्चों को शरीर के स्वस्थ वजन पर वापस लाया जाए, तो वे इस स्थिति से बच सकते हैं।

इस अध्ययन का संचालन करने के लिए, शोधकर्ताओं ने 3,00,000 से अधिक बच्चों का चयन किया जिनकी आयु 7 से 13 वर्ष के बीच थी और जिनका जन्म 1930 से 1989 के बीच हुआ था और उनके चिकित्सक परीक्षा अभिलेख का अध्ययन किया। इन आंकड़ों का इस्तेमाल बच्चों के वार्षिक बॉडी मास्स इंडेक्स की गणना के लिए किया गया था।

इसके अलावा, कुछ साल बाद, जब वे बच्चे अपनी वयस्कता तक पहुंचे तब उनके स्वास्थ्य का अध्ययन करने के लिए डेनमार्क की नागरिक पंजीकरण प्रणाली का उपयोग किया गया था। इन आंकड़ों का उपयोग उनके शरीर में शिरापरक घनास्र अंतःशल्यता (वीटीई) की उपस्थिति से संबंधित किसी भी प्रकार के वयस्क जोखिम को मापने के लिए किया गया था।

शिरापरक घनास्र अंतःशल्यता या वीटीई एक ऐसी स्थिति है जब एक गहरी शिरा में, आमतौर पर पैरों में रक्त के थक्के जम जाते हैं। यह स्थिति इतनी खतरनाक होती है कि यदि इनमें से एक भी थक्का फेफड़ों में चला जाए, तो यह शरीर के उस क्षेत्र में रक्त के प्रवाह को अवरुद्ध कर सकता है। यह फुफ्फुसीय अन्त: शल्यता का कारण भी बन सकता है, जो एक जानलेवा स्थिति है।

इस अध्ययन में पाया गया कि अपने बचपन में उच्चतम बॉडी मास्स इंडेक्स वाले प्रतिभागियों ने वयस्कता में रक्त के थक्के जमने की 30% से 50% तक की बढ़ी हुई संभावना दिखाई।

इसके अलावा, अध्ययन में इस बात का उल्लेख भी किया गया था कि इसके परिणाम सभी मामलों में बचपन के मोटापे और रक्त के थक्कों के गठन के बीच संबंध पर जोर नहीं देते हैं। इस अध्ययन से केवल यह पता चलता है कि मोटे बच्चों में वयस्कता में रक्त के थक्के जमने का अधिक खतरा हो सकता है।

इनके अलावा, कुछ आनुवंशिक कारक भी वयस्कता के दौरान रक्त के थक्कों के गठन के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

इस अध्ययन से यह भी पता चलता है कि जिन बच्चों का वजन कभी अधिक नहीं था या जो 13 साल की उम्र तक शरीर के सामान्य स्वस्थ वजन पर वापस आ गए थे, उनमें वीटीई होने का खतरा कम था।

इसलिए, यह मोटापे से ग्रस्त बच्चों को इस बीमारी के जोखिम को कम करने के लिए और शरीर को स्वस्थ वजन पर वापस लाने की कोशिश करने के लिए प्रेरित करता है।

इस अध्ययन के प्रमुख लेखक और डेनमार्क के आरहूस यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में एक महामारी विज्ञानी, डॉ जेन्स संडबोल ने कहा, "क्योंकि कम उम्र में अधिक बच्चे मोटापे का शिकार हो रहे हैं, इसलिए हमारे परिणाम बच्चों को वयस्कता में हृदय रोग से बचने के लिए उचित वजन प्राप्त करने और बनाए रखने में मदद करने पर केंद्रित हैं।"

बच्चों में मोटापा वह स्थिति है जब उनके शरीर का बॉडी मास्स इंडेक्स 95 प्रतिशत तक पहुंच जाता है या इस से भी पार हो जाता है। डायबिटीज एंड ओबीस जर्नल में एक वर्तमान अध्ययन के अनुसार, भारत में 5.74% से 8.82% तक स्कूली बच्चे मोटापे का शिकार होते हैं।

शरीर में रक्त के थक्कों का जमना एक बहुत ही आम समस्या है और इसका इलाज उन दवाओं के उपयोग से किया जाता है जिनमें रक्त को पतला करने की क्षमता होती है। ऐसा होने से शरीर में रक्त के प्रवाह में आसानी होती है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, इस अध्ययन के निष्कर्ष माता-पिता और बच्चों को स्वस्थ आहार करने और शारीरिक गतिविधि करने के महत्व और बचपन के मोटापे के दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में सिखाने की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।

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