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गंगा नदी में स्नान करते लोग।

अव्यवस्थित मलप्रवाह: गंगा में पानी की गुणवत्ता में गिरावट का प्रमुख कारण

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अव्यवस्थित मलप्रवाह: गंगा में पानी की गुणवत्ता में गिरावट का प्रमुख कारण
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गंगा में प्रदूषण हमेशा एक मुद्दा रहा है, लेकिन इससे निपटने की तत्काल ज़रूरत इससे अधिक कभी नहीं हुई है। गंगा नदी में जल प्रदूषण का प्रमुख कारण अव्यवस्थित मलप्रवाह बन रहा है।

गंगा नदी का उच्च आध्यात्मिक महत्व है, विशेष रूप से हिंदू धर्म के लिए। लेकिन गुज़रते वर्षों के साथ, यह पवित्र नदी विनाशकारी मानव गतिविधियों के कारण गंभीर कठिनाइयों का सामना कर रही है।

गंगा नदी अपने आस-पास रहने वाले लाखों लोगों को जीवन प्रदान करती है। यह न केवल इन लोगों को पानी प्रदान करती है बल्कि भोजन और परिवहन भी प्रदान करती है।

हाल ही के अध्ययनों के अनुसार, यह नदी प्रत्येक बीतते दिन के साथ और भी अधिक प्रदूषित होती जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि गंगा में प्रतिदिन लगभग 12,000 मिलियन लीटर (1200 करोड़ लीटर) मलप्रवाह उत्पन्न होता है।

इस कचरे का स्रोत शहरी आबादी है क्योंकि शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में बहुत अधिक है। लेकिन अध्ययन में गहराई से देखने पर पता चलता है कि इस शहरी आबादी में से काफी लोगों के पास उचित सीवेज निपटान के तरीके हैं।

समस्या इस कचरे से निपटने के तरीकों की है। इस तरह के अनुपचारित कचरे को सीधे नदियों में डाला जाता है।

जबकि, ग्रामीण क्षेत्रों में, अधिकांश लोग खुले में शौच करते हैं और इसलिए इस तरह के कचरे को नदियों में जाने का कोई मौका नहीं मिलता।

मानव शौच में पाए जाने वाले कोलीफॉर्म प्रमुख प्रदूषक होते हैं। इसमें वृद्धि जनसंख्या में वृद्धि का सीधा प्रभाव है।

गंगा में भारत का सबसे बड़ा त्यौहार कुम्भ मनाया जाता है। इस त्यौहार के 49 दिनों में 120 मिलियन (12 करोड़) से अधिक लोग अपने पापों को धोने के लिए इस पवित्र नदी में स्नान करते हैं, जिसका मतलब है कि इन दिनों के दौरान प्रदूषण में वृद्धि होती है।

संस्कृतियों के इस देश में पवित्र नदी के महत्व को दर्शाते हुए, डॉ वंदना शिवाजी ने एक बार कहा था, '' अगर गंगा रहती है तो भारत रहता है। अगर गंगा मर जाती है, तो भारत मर जाता है। ”

यह पहली बार नहीं है कि मलप्रवाह कचरे को नदियों में डाले जाने का मुद्दा प्रकाश में आया है। इस मुद्दे को कई बार पहले भी उठाया गया था। 2017 में, सरकार ने मलप्रवाह कचरे को नियंत्रित करने के लिए 54 स्थलों पर "सीवेज-ईटिंग" रोगाणुओं का उपयोग करने का निर्णय लिया था।

गंगा में प्रदूषण की इस वृद्धि के कारण, इस समस्या से व्यापक स्तर पर निपटने की आवश्यकता बढ़ गई है। इस समस्या से निपटने के लिए ऑफ-ग्रिड शौचालयों या विकेंद्रीकृत उपचार संयंत्रों जैसी नई विधियों का उपयोग किया जा सकता है।

भारत सरकार को प्रदूषण नियंत्रण विभाग को अधिक धन प्रदान करना चाहिए। साथ ही, लोगों को अनुचित कचरे से निपटने के तरीको के परिणामों के बारे में अधिक जानकारी होनी चाहिए।

प्रदूषण पर नियंत्रण लेने के लिए 3R नियम यानि रिड्यूस, रीयूज, रीसायकल को हर इंसान अपने स्तर पर लागू करना चाहिए।

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