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पार्किंसंस रोग एक केंद्रीय तंत्रिका विकार है जो हमारे शरीर के संचालन को प्रभावित कर सकता है।

पार्किंसंस रोग को रोकना अब संभव हो सकता है

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पार्किंसंस रोग को रोकना अब संभव हो सकता है
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ब्रिस्टल, यूके के शोधकर्ताओं द्वारा एक ऐसा अग्रणी नैदानिक परीक्षण किया गया है जिसमें पार्किंसंस रोग को धीमा करने, रोकने या उलटने के तरीकों पर काम किया गया है।

इस परीक्षण के परिणाम जर्नल ऑफ़ पार्किंसंस रोग में 27 फरवरी, 2019 को प्रकाशित किये गए हैं।

इस नैदानिक परीक्षण के तहत, प्रतिभागियों के मस्तिष्क में सीधे एक प्रायोगिक उपचार किया गया। इस परीक्षण में यह पाया गया की इससे पार्किंसंस रोग में क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को बहाल किया जा सकता है।

पार्किंसंस रोग एक केंद्रीय तंत्रिका का विकार है जो हमारे शरीर के संचालन को प्रभावित कर सकता है। इस बीमारी के कारण शरीर में कंपन, धीमी गति, संतुलन की कमी और कठोरता आ जाती है।

इस परीक्षण के शोधकर्ता स्वाभाविक रूप से होने वाले विकास के कारणों के स्तर को बढ़ाने से रोगियों में डोपामाइन मस्तिष्क कोशिकाओं की मृत्यु की संभावना को जांचना चाहते थे। स्वाभाविक रूप से होने वाले इस विकास कारक को ग्लियाल सेल लाइन-व्युत्पन्न न्यूरोट्रोफिक कारक (जीडीएनएफ) के नाम से भी जाना जाता है।

इस जीडीएनएफ परीक्षण के तहत, छह रोगियों द्वारा प्रारंभिक अध्ययन में भाग लिया गया। यह अध्ययन इस नए उपचार की सुरक्षा का आकलन करने के लिए किया गया था। तथापि, इस नौ महीने के अध्ययन में 35 व्यक्तियों ने भाग लिया। इस परीक्षण में, कुछ को जीडीएनएफ के मासिक संचार दिए गए और कई प्रतिभागियों को प्लेसीबो का संचार प्राप्त हुआ था।

लेखक के विचार

इस अध्ययन के प्रमुख अन्वेषक, एलन एल वोन ने कहा, "मस्तिष्क परिक्षण में सुधार के स्थानिक और सापेक्ष परिमाण पार्किंसंस के लिए शल्य चिकित्सा द्वारा दिए गए विकास-कारक उपचार के परीक्षणों में पहले पायी गई कुछ चीजों से परे है। यह कुछ सम्मोहक सबूतों का प्रदर्शन करता है, फिर भी हमारे पास संभवतः डोपामाइन मस्तिष्क कोशिकाओं को फिर से पुनर्स्थापित करने का साधन है जो धीरे-धीरे पार्किंसंस रोग में नष्ट हो जाते हैं।"

डॉ वोन ने यह भी कहा, "इस उपचार को जानने के लिए इस अनुसंधान को जारी रखना बेहद आवश्यक है। जीडीएनएफ में पार्किंसंस से पीड़ित लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की क्षमता देखी गयी है।"

एक मुख्य तंत्रिका विज्ञान शास्त्री स्टीवन गिल के अनुसार, "इस परीक्षण से यह पता चलता है कि हम कई महीनों या वर्षों तक दवाओं को सुरक्षित रूप से और बार-बार सीधे मरीजों के दिमाग में पहुंचा सकते हैं।"

डॉ गिल ने यह भी कहा, "यह पार्किंसन जैसी स्नायविक स्थितियों के इलाज की हमारी क्षमता में एक महत्वपूर्ण सफलता है, क्योंकि अधिकांश दवाएं प्राकृतिक सुरक्षात्मक बाधा के कारण मस्तिष्क में रक्तप्रवाह को पार नहीं कर पाती हैं।"

अध्ययन का विवरण

जीडीएनएफ अध्ययन के शुरुआती नौ महीनों के बाद, ओपन-लेबल एक्सटेंशन अध्ययन शुरू किया गया था। इस अध्ययन के तहत जीडीएनएफ के संपर्क में आने वाले प्रभावों और उसमें सुरक्षा का अध्ययन किया गया। यह अध्ययन 40 सप्ताह के लिए किया गया था।

यह बताया गया है कि जीडीएनएफ और प्लेसबो अध्ययन में इलाज किए गए सभी 41 रोगियों को पंजीकृत किया गया था और इस प्रशिक्षण का निष्कर्ष ओपन-लेबल एक्सटेंशन अध्ययन में निकाला गया था।

शोधकर्ताओं ने बताया कि नौ महीनों के बाद, पीईटी स्कैन में उन लोगों में कोई परिवर्तन नहीं पाया गया जिन्हें प्लेसबो दिया गया था। हालांकि, जिन रोगियों को जीडीएनएफ दिया गया था, उनके मस्तिष्क के प्रमुख क्षेत्र में सुधार देखा गया।

यह अभी भी अप्रत्याशित है कि नैदानिक लाभ पीईटी स्कैन में जैविक परिवर्तनों में देरी करते हैं या इनका विकास होने के लिए अधिक समय की आवश्यकता होती है।

हालाँकि, इन दो अध्ययनों के संयुक्त परिणामों से यह उजागर हुआ है कि रोगी की खोपड़ी पर चढ़े द्वार के माध्यम से हर चार सप्ताह में जलसेक करना संभव है। इसकी दवा को प्रशासित करने की यह नई विधि अच्छी तरह से सहन की जा सकती है।

शोधकर्ताओं द्वारा दी गयी जानकारी से यह यह स्पष्ट हो जाता है कि पार्किंसंस रोग के लिए न्यूरोरेस्टोरेटिव उपचार में उच्च खुराक के उपयोग सहित जीडीएनएफ की भविष्य की भूमिका निर्धारित करने के लिए जीडीएनएफ के बड़े पैमाने पर परीक्षण की अभी भी आवश्यकता है।

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