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जब एक जीवाणुनाशक दवा का उपयोग किया जाता है, तो जीवाणु मरते नहीं हैं, बल्कि एक सोने की मुद्रा में बने रहते हैं।

जीवाणु की जीवन रक्षा रणनीति की खोज

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जीवाणु की जीवन रक्षा रणनीति की खोज
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एम्स्टर्डम विश्वविद्यालय (UvA) के जीवविज्ञानियों ने भुखमरी से बचने के लिए जीवाणु की एक वैकल्पिक रणनीति की खोज की है जिसके बारे में पहले पता नहीं था। यह अध्ययन 21 फरवरी 2019 को नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित हुआ था।

एक मानव शरीर में, जीवाणुनाशक दवाओं की प्रक्रिया के दौरान, जीवाणु आमतौर पर एक गहरी नींद में चले जाते हैं जहां उन्हें जीवित रहने के लिए कई पोषक तत्वों की आवश्यकता नहीं होती है। जीवाणु मरते नहीं हैं, बल्कि एक सोने की मुद्रा में बने रहते है और अनुकूल परिस्थितियों में फिर से उठने की प्रतीक्षा करते हैं।

तनाव के तहत, जीवाणु अंतर्बीजाणु बनाते हैं। कठोर परिस्थितियों के दौरान, जीवाणु खुद को एक मजबूत परत में बंद कर लेता है और सो जाता है।

शोध का विवरण

अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने पाया कि बैक्टीरिया वास्तव में सोते नहीं हैं, लेकिन असाधारण रूप से धीमा हो जाते हैं।

शोध में बेसिलस सबटिलिस के अध्ययन और जीवन रक्षा कार्य शामिल थे। बैसिलस सबटिलिस एक जीवाणु है जो मिट्टी में पाया जाता है। यह जीवाणु चरम मौसम की स्थिति से बच सकता है। यह जीवाणु गैर-रोगजनक होता है जिसका मतलब है कि यह बीमारी या नुकसान नहीं पहुँचाता।

वैज्ञानिकों ने एक संशोधित बेसिलस सबटिलिस का उपयोग किया जो और अंतर्बीजाणु बनाने में सक्षम नहीं था। वैज्ञानिकों ने जीवाणु को भूखा रखा। वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि कुछ जीवाणु लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं। सो रही अवस्था से फिर से जागे बिना जीवाणु जीवित रहा।

जीवाणु एक ऐसी अवस्था में शरण लेता है जो अभी तक अज्ञात है। जीवाणु पूरी तरह से सक्रिय नहीं होते और न ही वे सो रहे होते हैं। जीवाणु, इसके विपरीत, प्रक्रिया को बहुत कम स्तर तक धीमा कर देता है।

अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि जीवाणु पूरी तरह से बंद नहीं हुए, बल्कि इसने उन प्रक्रियाओं को बदल दिया, जो आमतौर पर सक्रिय होने पर होती हैं। जब जीवाणु सक्रिय होता है तब वह हर 40 मिनट में विभाजित होता है। लेकिन जब जीवाणु धीमा हो गया, तो वही प्रक्रिया हर 4 दिनों में एक बार हुई। यह प्रक्रिया सामान्य से सौ गुना धीमी है।

यह धीमी गति से जीवन रक्षा की वैकल्पिक रणनीति प्रक्रिया को वैज्ञानिकों द्वारा ओलिगोट्रोफिक विकास के रूप में नामित किया गया है। ओलिगोट्रोफिक वृद्धि का अर्थ है 'कम पोषण वाली वृद्धि'।

शोधकर्ता के विचार

लेन्डर्ट हैमोन, महाध्यापक और अध्ययन के टीम लीडर कहते हैं, “अब बड़ा सवाल यह है कि क्या बैसिलस के अलावा अन्य जीवाणु भी इस चाल को जानते हैं? यदि हां, तो यह मूलभूत रूप से जीवाणु के लिए हमारे दृष्टिकोण को बदल देता है। जाहिर है, उन्हें हमेशा जीवित रहने के लिए बीजाणु का निर्माण नहीं करना पड़ता है।”

हैमोन ने यह भी कहा, “अंतर्बीजाणु बनाने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, और जीवाणु हमेशा इस स्थिति से 'जागने’ में सक्षम नहीं होते। उनके लिए इस ओलिगोट्रोफिक विकास स्थिति में बदल जाना आसान होता है। एक बार स्थिति में सुधार होने के बाद, वे आसानी से नई उपनिवेश बना सकते हैं। इसलिए यह स्थिति उनके लिए अधिक अनुकूल होती है।”

यह एक और सवाल पैदा करता है कि जीवाणु प्रतिजीवी दवाओं से कैसे बच सकते हैं। यदि और अधिक ऐसे जीवाणु पाए जाते हैं जो जीवन रक्षा की एक वैकल्पिक स्थिति को चुनने में सक्षम हों तो यह एक चिंता का विषय है। इससे बचने के लिए बेहतर समझ की आवश्यकता है।

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