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इस अध्ययन के अनुसार, 33,501 से अधिक युवाओं ने खुद को आत्म-विषाक्तता गतिविधियों में शामिल किया।

युवाओं में आत्म-विषाक्तता के मामलों में जबरदस्त वृद्धि

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युवाओं में आत्म-विषाक्तता के मामलों में जबरदस्त वृद्धि
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शोध में पाया गया है कि ऑस्ट्रेलिया में आत्म-विषाक्तता में शामिल होने वाले युवा लोगों और मानसिक विकारों के लिए ली जाने वाली दवाओं के सेवन की संख्या में भारी वृद्धि हुई है।

यह अध्ययन सिडनी विश्वविद्यालय और एनएसडब्लयू पोइसंस इनफार्मेशन सेंटर द्वारा किया गया है। यह 21 फरवरी 2019 को BMJ ओपन में प्रकाशित हुआ था।

इस अध्ययन के संचालन के लिए, शोधकर्ताओं ने ऑस्ट्रेलियाई जहर सूचना केंद्रों से विष के प्रयोग या दवाओं की अधिक मात्रा का सेवन करने द्वारा जानबूझकर किए आत्म-नुकसान की जानकारी एकत्र की। प्रतिभागियों की आयु 5-19 वर्ष थी और यह जानकारी 10 वर्ष के समय 2006 से लेकर 2016 तक की था।

अध्ययन के संचालन के लिए फार्मास्युटिकल्स बेनिफिट स्कीम (PBS) डेटाबेस में वितरित होने वाली दवाइयों के चलन पर भी विचार किया गया। स्वयं को नुकसान पहुंचाना एक जटिल मुद्दा है, क्योंकि यह इसमें उलझे हुए व्यक्ति के लिए कई घटनाओं के संचय का परिणाम है। किन्तु शरीर के अन्य मुद्दों की तरह, मानसिक बीमारी का भी इलाज किया जा सकता है।

अध्ययन के परिणाम

इस अध्ययन में बात किए गए जहर में ज्यादातर घरेलू उत्पाद और बिना पर्चे की दवाएं जैसे पैरासिटामोल, इबुप्रोफेन, फ्लुओक्सेटीन, इथेनॉल, क्वेटियापाइन, पेरासिटामोल / ओपिओइड संयोजन, सेराट्रलीन और एस्किटालोप्राम और अवसादरोधक शामिल हैं।

अध्ययन में पाया गया कि 33,501 से अधिक युवा खुद को नुकसान पहुंचाने और जहर लेने जैसी गतिविधियों में शामिल हुए हैं। 2006 से 2016 तक, इस आंकड़े में 98% की वृद्धि हुई है।

सेलेक्टिव सेरोटोनिन रिअपटेक इनहिबिटर (SSRI) का उपयोग 5-14 वर्ष की आयु के लोगों में 40% और 15-19 वर्ष की आयु के लोगों में 35% बढ़ा है। इसके अलावा, 5-19 वर्ष की आयु के लोगों में मनोविकार के प्रति प्रभावकारी दवाओं के वितरण में 11% की वृद्धि हुई और एडीएचडी दवा के वितरण में 14% की वृद्धि हुई।

अध्ययन से यह भी पता चलता है कि आत्महत्या की गतिविधियों में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में अधिक थी। इस संबंध में महिलाओं से पुरुषों का अनुपात 3:1 था।

विशेषज्ञों की राय

यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिडनी स्कूल ऑफ़ फार्मेसी से अध्ययन के प्रमुख लेखक, और एनएसडब्लयू पोइसंस इनफार्मेशन सेंटर में वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. रोज़ केर्न्स ने कहा, “युवा लोगों में आत्म-विषाक्तता की संख्या पिछले दशक में लगभग दोगुनी हो गई है, जो की खतरनाक है। हमने पाया है कि कम उम्र में आत्म-विषाक्तता हो रही है और सबसे अधिक प्रभावित लोग वह हैं जो 1997 के बाद पैदा हुए हैं। हमने बच्चों और किशोरों में नशीली दवाओं के उपयोग को भी देखा, और विशेष रूप से मनोविकार के प्रति प्रभावकारी दवाओं के उपयोग में बड़ी वृद्धि भी देखी है।"

निकोलस बकले, अध्ययन के वरिष्ठ लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिडनी मेडिकल स्कूल के प्राध्यापक ने कहा, “अध्ययन के नतीजे एक ऐसी पीढ़ी का संकेत देते हैं जो आत्म-क्षति में तेजी से उलझ रही है और मानसिक विकारों के लक्षणों के इलाज के लिए तेजी से निर्धारित दवाओं का उपयोग करती है।"

उन्होंने कहा, "आत्महत्या दुनिया भर में किशोरों के बीच मौत का तीसरा सबसे आम कारण है। पिछले अध्ययनों से पता चला है कि आत्म-हानि भविष्य में होने वाली आत्महत्या के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक है, इसलिए हमारी चिंता यह है कि इससे ऑस्ट्रेलियाई आत्महत्या दर में भविष्य में वृद्धि हो सकती है।"

ऑस्ट्रेलिया में, आत्महत्या के इन मामलों में से लगभग 80% आत्म-विषाक्तता पर आधारित हैं। न केवल ऑस्ट्रेलिया बल्कि दुनिया के अन्य देश भी इस समस्या से पीड़ित हैं, जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन और भारत शामिल हैं। 2018 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 33.8% युवा आत्म-हानि तकनीकों में शामिल थे।

अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि इस समस्या को दूर करने की तत्काल आवश्यकता है। युवा पीढ़ी को आत्म-विषाक्तता को खत्म करने के लिए इसका सामना करने वाली रणनीतियां बनाने और इससे ठीक होने के लिए एक अलग दृष्टिकोण की आवश्यकता हो सकती है।

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